
जमुआ के मिर्जागंज मंडी 70-80 के दशक में महत्वपूर्ण व्यवसायिक मंडी थी। जहां खाद्यान्न, सोना-चांदी और कपड़ों की खरीद फरोख्त होती थी। व्यापारियों का मानना है कि सरकारी उदासीनता के कारण यह मंडी विकास से बहुत पीछे रह गया। बताते चलें कि जमुआ-देवघर मुख्य मार्ग और जमुआ से तीन किलोमीटर दूर मिर्जागंज 70-80 के दशक में एक बड़ी व्यवसायिक मंडी के रूप में विख्यात थी। विभिन्न प्रकार की खाद्यान्नों की थोक मंडी के रुप में जिलेभर में महत्वपूर्ण स्थान रखनेवाली मिर्जागंज मंडी की व्यवसायिक चमक अब अतीत का हिस्सा बनकर रह गयी है। बताया जाता है कि यहां के व्यापारी देश के बड़ी मंडियों मसलन कानपुर, नासिक, हापुड़, पटना आदि जगहों से माल मंगवाकर पूरे जिले में आपूर्ति करते थे।
तब इस मंडी में जिले के तिसरी, गावां, मालडा, देवरी, चकाई, राजधनवार, सरिया, बगोदर ,जमुआ, यहां तक पचम्बा के भी खुदरा व्यवसाई इसी मंडी से खाद्यान्न की खरीददारी करते थे। खाद्यान्न के अतिरिक्त यहां सोना-चांदी, कपड़ा और माइका की भी खरीद-बिक्री बड़े पैमाने पर होती थी। सूत्रों के मुताबिक प्रसिद्ध माइका कारोबारी बीएन सहाय का लंबा चौड़ा कारोबार मिर्जागंज मंडी में ही था। इस बाबत मिर्जागंज बाजार के व्यवसाई सीता राम साव उर्फ सीतो साव ने बताया कि मंडी में पदाधिकारियों की अनावश्यक छापेमारी और कमीशनखोरी का नतीजा है कि मिर्जागंज मंडी अपनी व्यवसायिक चमक खो चुकी है। कहा कि व्यवसायों को समर्थन की बजाय पदाधिकारियों ने सिर्फ डराया और धमकाया ही है। परिणामस्वरूप मंडी बजार में तब्दील होकर रह गयी है। व्यवसाय रामप्रसाद साव ने कहा कि स्थानीय स्तर पर दुकान बाजार के विस्तार में मिर्जागंज मंडी के महत्व को कम किया है। फिर भी कई वस्तुओं की थोक बिक्री अब भी यहां की जाती है। नरेश साव का कहना था कि मंडी के विकास में सरकारी नीतियों और इंस्पेक्टर राज बाधक रहा। यही कारण है कि स्थानीय व्यवसायी विवश होकर थोक व्यापार से किनारा कर लिया। व्यवसायी अशोक साव ने कहा कि अब भी वक्त है मिर्जागंज मंडी की व्यवसायिक चमक लौटाई जा सकती है। इन लोगों ने कहा कि अब मिर्जागंज मंडी की पहले जैसी बात नहीं रही। अब मिर्जागंज मंडी सिर्फ बाजार बनकर ही रह गया है। कहा कि पूर्व में यहां दिनभर बाहरी व्यापारियों का तांता लगा रहता था। फिलहाल अब यहां वह रौनक देखने को नहीं मिलती।
